हिन्दुओं के शास्त्रों में पवित्र वेद व श्रीमद् भगवद् गीता विशेष हैं। उनके साथ-साथ अठारह पुराणों को भी समान दृष्टि से देखा जाता है। श्रीमद् भागवत सुधासागर, रामायण, महाभारत भी विशेष प्रमाणित शास्त्रों में से हैं। विशेष विचारणीय विषय यह है कि जिन पवित्र शास्त्रों को हिन्दुओं के शास्त्र कहा जाता है, जैसे पवित्र चारों वेद व पवित्र श्रीमद् भगवत गीता जी आदि, वास्तव में ये सद् शास्त्र केवल पवित्र हिन्दु धर्म के ही नहीं हैं। ये सर्व शास्त्र महर्षि व्यास जी द्वारा उस समय लिखे गए थे जब कोई अन्य धर्म नहीं था। इसलिए पवित्र वेद व पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी तथा पवित्र पुराणादि सर्व शास्त्र मानव मात्र के कल्याण के लिए हैं।
पवित्र यजुर्वेद अध्याय 1 मंत्र 15-16 तथा अध्याय 5 मंत्र 1 व 32 में स्पष्ट किया है कि –
‘‘{अग्नेः तनूर् असि, विष्णवे त्वा सोमस्य तनुर् असि, कविरंघारिः असि, स्वज्र्योति ऋतधामा असि}
परमेश्वर का शरीर है। पाप के शत्रु परमेश्वर का नाम कविर्देव है। उस सर्व पालन कत्र्ता अमर पुरुष अर्थात् सतपुरुष का शरीर है। वह स्वप्रकाशित शरीर वाला प्रभु सत धाम अर्थात् सतलोक में रहता है।
पवित्र वेदों को बोलने वाला ब्रह्म यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 8 में कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा कविर्मनीषी अर्थात् कविर्देव ही वह तत्वदर्शी है जिसकी चाह सर्व प्राणियों को है। वह कविर्देव परिभूः अर्थात् सर्व प्रथम प्रकट हुआ, जो सर्व प्राणियों की सर्व मनोकामना पूर्ण करता है। वह कविर्देव स्वयंभूः अर्थात् स्वयं प्रकट होता है। उसका शरीर किसी माता-पिता के संयोग से (शुक्रम् अकायम्) वीर्य से बनी काया नहीं है। उसका शरीर (अस्नाविरम्) नाड़ी रहित है अर्थात् पांच तत्व का नहीं है। केवल तेजपुंज से एक तत्व का है। उदहारण के लिए जैसे एक तो मिट्टी की मूर्ति बनी है, उसमें भी नाक, कान आदि अंग हैं तथा दूसरी सोने की मूर्ति बनी है, उसमें भी सर्व अंग हैं। ठीक इसी प्रकार पूज्य कविर्देव का शरीर तेज तत्व का बना है इसलिए उस परमेश्वर के शरीर की उपमा में अग्नेः तनूर् असि वेद में कहा है।
इसमें श्रीमद् भगवद् गीता का सारांश तथा अनुवाद है जिसमें प्रत्येक अध्याय का भिन्न-भिन्न विश्लेषण किया गया है। विश्व में एकमात्र गीता का यथार्थ प्रकाश किया गया है। मुझ दास (रामपाल) के अतिरिक्त वर्तमान तक गीता के गूढ़ रहस्यों को कोई उजागर नहीं कर सका। सभी ने शब्दों के अर्थ भी गलत किए हैं तथा श्लोकों का भावार्थ ही बदल दिया।
उदाहरण के लिए गीता अध्याय 18 श्लोक 66 का भावार्थ है कि गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य परमेश्वर की शरण में जाने के लिए कहा है। व्रज का अर्थ जाना है, परंतु मेरे अतिरिक्त सर्व अनुवादकों ने ‘‘व्रज’’ का अर्थ आना किया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि गीता अध्याय 18 के ही श्लोक 62 में स्पष्ट व ठीक अर्थ किया है कि गीता बोलने वाले काल ब्रह्म ने अपने से अन्य परम अक्षर ब्रह्म यानि परमेश्वर की शरण में जाने को कहा है।
वह परमेश्वर कौन है? इसका ज्ञान हिन्दू गुरूओं को नहीं है। जिस कारण से भोली जनता को भ्रमित करते रहे हैं कि श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान बोला तथा अपनी ही शरण में आने के लिए कहा है।
जबकि अनेकों अध्यायों के श्लोकों में गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य उत्तम पुरूष यानि पुरूषोत्तम अविनाशी परमेश्वर के विषय में स्पष्ट कहा कि वही परमात्मा कहा जाता है। तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है। प्रमाण – गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में। इसके अतिरिक्त गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में उसे परम अक्षर ब्रह्म कहा है। इसी अध्याय के श्लोक 8, 9, 10 में उस दिव्य परमपुरूष की भक्ति करने से साधक उसी को प्राप्त होता है। इसी अध्याय 8 के श्लोक 20, 21, 22 में उसी अन्य अमर परमात्मा (सत्य पुरूष) की महिमा कही है जो इस पवित्र पुस्तक में पढ़ने को मिलेंगे। आप अपने को धन्य समझेंगे।
हिन्दू धर्मगुरूओं को यह भी ज्ञान नहीं है कि श्रीमद् भगवद् गीता का ज्ञान श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने कहा था। जैसे प्रेत किसी के शरीर में प्रवेश करके बोलता है।
पढ़ें प्रमाण सहित श्रीमद् भगवद् गीता सत्य सार।
भगवद गीता अध्याय 2 में पढ़िए – गीता ज्ञान बोलने वाले के भी जन्म-मृत्यु होते हैं
भगवद गीता अध्याय 4 में पढ़िए – गीता ज्ञान बोलने वाला भी जन्मता-मरता है
भगवद गीता अध्याय 6 में पढ़िए – मन को रोकना वायु रोकने के समान
भगवद गीता अध्याय 7 में पढ़िए – ब्रह्मा विष्णु शिव (त्रिगुण माया) जीव को मुक्त नहीं होने देते
© Bhagavad Gita. 2024. Design HTML Codex